December 26, 2009

वो चला गया

वो चला गया

जब डेढ़ पहर की धूप तेरे

दरवाज़े पे आ दस्तक दे

और हवा में लिपटे वो परदे

जब पूछें मेरे बारे में

तो कहना की वो चला गया…

घर ख़ामोशी की ख़ुशबू से

जब इतर की बातें करता हो

इक शौक़ बड़ी बेसबरी से

कुछ सबर की बातें करता हो

और याद के कोने कोने से

इक महक संदली आती हो

या खिड़की भर बदली कोई

मुझे नज़र से छूना चाहती हो

तुम कहना की वो चला गया…

अब शहर-शोर से दूर कहीं

मेरे अंदर आकर बसा है वो

कोई चाहकर खोल न पायेगा

इस तरह रगों में कसा है वो

तुम सब उसको न याद करो

उस की सब यादें मेरी हैं

क्यों तुम सबने फिर यूँ मिलकर

उस भरम की बातें छेड़ी हैं

कि है या नहीं है इश्क़ मुझे

वो भरम कभी का चला गया…

–=–

Vo Chala Gaya

Jab dedh pahar ki dhoop tere

Darwazey pe aa dastak de

Aur hawa mein lipte vo parde

Jab poochhein mere bare mein

To kehna ki vo chala gaya…

Ghar khamoshi ki khushboo se

Jab itar ki baatein karta ho

Ik shauk badi besabri se

Kuchh sabar ki batein karta ho

Aur yaad Ke kone kone se

Ik mahak sandali aati ho

Ya khidki bhar badli koi

Mujhe nazar se chhoona chahti ho

Tum kehna ki vo chala gaya…

Ab shehar-shor se door kahin

Mere ander aakar basa hai vo

Koi chah kar khol na payega

Iss tarah ragon mein kasa hai vo

Tum sab usko na yaad karo

Uski sab yaadein meri hain

Kyon tum sabne phir yun milkar

Us bharam ki baatein chhedi hain

Ki hai ya nahin hai ishq mujhe

Vo bharam kabhi ka chala gaya

–=–

8 responses to “वो चला गया”

  1. prashant tripathi says:

    marvellous,,,,lost my word

  2. kaafi lambe arse baad, aap aap hue hain!
    kitni bhi mubarkbaad doon kam hai!
    bahut pyari hai ye nazm irshaad bhai !
    … Aadzab

  3. smriti says:

    Wonderful as always irshadji.

  4. RUTUJA says:

    mind blowing…awesome…full of passion and love…..gr8 as usual from U…

  5. rashmi badshah says:

    chala gaya! ye jo ”raft” aor ” bood”hai na? ye bahot dard deta hai ”chala gaya”kahna aasan nahin hai irshad sahab !ragain khinchne lagti hain !aap ki nazm ki is line ne dil nikal liya main ne jaana aor chalna mahsoos kiya hai
    ”main ne usko kho ke aakhir wo saza pai ke bus……….!”

  6. garima srivastav says:

    जब कोई रगो में बस जाये तो वो जा कर भी कहीं नहीं जाता और यादें इस कदर ताज़ी होती हैं कि वातावरण में वक्त का गुज़रा पल पता नहीं चलता…सारी स्मिर्तियाँ इस कदर आवा जाही करती रहती हैं जैसे सब कुछ अभी अभी की बात है…पहले भी धूप आती होगी आगे भी आयेगी बस उनके आने के साथ उसका होना बचा रहेगा जिसे भरने के लिये वक्त हमेशा उसे याद रखेगा…हवा में लिपटे पर्दे पूछेंगे… खामोशी उसकी हसीं माँगेगी और घर उस हसीं की खुशबू…उसे छू लेने के लिये एक टुकड़ा बदली राह ढूढँती दिखेगी…हर दिन सब्र का इंतहान होगा कि वो इसी वक्त तो आता था…आता ही होगा…चले जाने का सच इंतज़ार की दुनिया वाले नहीं स्वीकार करते…इसी लिये तो उसकी एक एक याद को इतनी बारीकी से और विस्तार से स्मिर्तियों में सहेज लेते हैं कि चले जाने को याद करो तो भी याद आते हैं और हुआ करता था को याद करें तो भी याद आते हैं और कहीं न कहीं मन के कोने में एक सम्भावना बची रहती है कि वो फिर आयेगा इसलिये भी उसका होना उसी ताज़गी से याद रहता है…उसकी यादों पर दावेदारी भ्रम को भी एक चेहरा देती है कि वो साथ है… और यहाँ तो भ्रम की गुन्जाइश ही नही है कि ये इश्क है…इतना कुछ याद रख कर किसी को अपनी ज़िन्दगी से चाह कर भी विदा नही किया जा सकता…वो रहेंगे… अगर शमशेर की पक्तियाँ याद करें तो…

    “मेरी यादों में बसी है
    इशारे की तरह
    तेरे नाम की
    छोटी सी, नन्ही सी, प्यारी सी,
    तिरछी सी स्पेलिंग”….

  7. kavita says:

    simply superb sir..a love going from physicality to soul existence.. i guessed missed a lot of blogs while i was away on vacation..

  8. inderjit says:

    Dear Irshad,
    Have been drawn for a while by your choice of earthy metaphors that make the ordinary special. This was a delectable piece that weaves the story of progression, it transcends to divine love like a sufi mystic turns in ecstatic joy and it takes him into an upward spiral of exaltation! Lovely write!

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