December 26, 2009

Maa Mungphali Hai

Sardi safed dhund ki jaalidaar chaadar odhey mujhe dekh rahi thi aur main NAARU ki dukaan se 25 paise ki garam mungphali le raha tha. Maine mungphali jeib mein daali to uske garam hone ka ehsaas meri daain jaangh ko chhoo gaya. Sardi mujhe dekh kar muskura rahi thi aur main mungphali se bhari jeib dekh kar. Maine ek mugfali neekali aur usko todney laga…5 saal ki umar ke chhote chhote haath sardi ki wajah se sunn ho chukey the…ya mujh mein tab shayad mungphali todney ka bhi hunar nahin tha…pata nahin kya tha.

Mungphali lekar ghar jaatey huey raste mein bhai mil gaya…bada tha…us waqt mere liye sab se taaqatwar insaan…jo mere saare doston ko peet sakta tha, dara sakta tha, khelte khelte ghar bhaga sakta tha…aur mujhe hara sakta tha sard razaion ke ooper hone wali har kushti mein. Maine usey roka,

“bhai meri mungphali todo”

Usney mungphali li, todi, aur mere chehre par mungphali ke sawaad jaisi muskaan aa gayi, lekin us tooti hui mungphali ke daane mere haath mein aane ki bajaye uske munh mein chale gaye. Maine udaas aankhon se bhai ko dekha to vo bola,

“aur nikal”

Maine bina kuchh bole 2-4 aur nikal kar usey di,  iss umeed se ki mungphali chabane ka jo sawaad vo le raha hai vo jald he mujhe bhi milega. Lekin aisa nahin hua.

“ja ghar jaakar didi se chhilwa le, main tution ja raha hun”

“meri 4 mungphali vapis karo”

“tere paas hain na itni…jeib mein”

Vo mere chehre ki udaasi aur mayusi ko bina padhey tuition padhney chala gaya. Aur maine jeib ko haath laga kar dekha kitni kam ho gayin. 5-7 kam thin aur maine ek bhi nahin khai thi. Ab sardi mujhe muskurati hui nahin chidhati hui lag rahi thi. NAARU ki dukaan se ghar tak ka faasla 100 kadam se zyada ka nahin tha lekin phir bhi sard mausam mein garam mungphali ke sawaad ki ichha itni tez hui ki main daudne laga ghar ki taraf.

Didi aangan mein baithi BUSH ke radio par ALL INDIA RADIO KI URDU SERVICE sun rahi thi…dopehar 3.30 baje shuru honewala programe Aapki Pasand.

“Didi mungphali chheel doge?”

Didi ne meri taraf dekha aur tunak kar boli, “tujhe khaane ke siva koi kaam nahin hai…kisne diye paise?”

“Ammi ne” maine bahut sehmi hui aawaaz mein kaha.

“To ja ammi se he chhilwa”, pata nahin kis baat ki naraazgi jatate huey usne jawaab diya.

“Ammi kahan hai?”, maine darte darte poochha kyonki usko kabhi bhi chaanta maarne ka haq tha. Mujhe padhati jo thi vo aur kehti bhi rehti thi ki main nalayak hun, mere dimaag mein pata nahin kya bhara hai, mujhe koi bhi baat ek baar mein samajh nahin aati. Shayad sach he bolti hogi vo.

Usne ye batane ki bajaye ki ammi kahan hai mujhse sawaal kiya, “Ab ammi ko tang karega tu?”

Main koi jawaab na de saka kyonki maine kabhi sapne bhi nahin socha tha ki main apni Ammi ko tang kar sakta hun. Main chup raha aur bas aankhein jhuka lin.

“Ooper chhat pe hai”

Didi ke gairzaroori sawaal se sehmey huey mere paanv seedhiya chadhney lagey. Main chhat pe pahuncha. Ammi sabko dopehar ka khana khila kar ab shayad dhoop mein baith kar khud khana khaane ki tayyari mein thi. Main bhaag kar peeth ki taraf se uske galey se lipat gaya. Uske munh mein khaane ka pehla niwala tha. Shayad thoda gala bhi ghunt gaya tha mujhse uska, zor se gale lipatne ki wajah se. usne mera baaju pakad kar mujhe aagey kiya aur poochha, “kya hua…”

“Mungphali nahin toot rahi”

Vo muskurai aur boli, “la main todke deti hun”.

Vo mujhe mungphali todna aise sikhane lagi jaise ye bhi koi hunar hota hai. Jaise isey seekh kar main zindagibhar peit bharne ki chinta se mukt ho sakta hun, jaise ye hunar sirf uske he bachchey ko aata hai mohalle bhar mein. Aakhiri mungphali mere haath mein thi aur main usey pehli ungli aur angoothey mein daba kar todney ki koshish kar raha tha.

“Thoda aur zor laga…shabbaash”

Ammi ke hausle ne mujhse aur zor lagwa diya aur mungphali toot gayi, pata nahin ammi ke hausle se ya mere zor se. mere dedh inch ke honth khushi ke mare kaano tak phail gaye.

“Mera beta sab kar sakta hai…” ammi ne muskurate huey kaha. Tabhi didi ooper aayi.

“Ammi aur roti laun?”

Ab ammi ne doosera niwala toda tha. Vo shayad bhool gayi thi ki mujhe mungfala todna sikhane se zaroori tha ki vo khud khana kha le pehle. Didi ne ammi ki plate ki taraf dekha.

“Aapne to abhi shuru bhi nahin kiya khana, mujhe pata tha ye ooper aaya hai to zaroor tang karega aapko”

Tab mujhe itni samajh nahin thi ki didi se kahun, ‘didi tumhari bhi shaadi hogi…tum bhi maa banogi…tab tumhe pata chalega ki koi bhi bachcha maa ko kabhi tang nahin karta’. Ab samajh aayi hai to didi mujhse pehle he iss baat ko jaan chuki hai ki koi bhi bachcha apni maa ko kabhi tang nahin karta.

Maa mungphali ki tarah hoti hai. Bahar se sakht ander daano ki tarah bahut kuchh bhara rehta hai usmein. Vo bahut kuchh kya hai koi pita kabhi nahin jaan sakta. Luv u Maa.

-=-=-

माँ मूंगफली  है

सर्दी  सफ़ेद  धुंध   की  जालीदार  चादर  ओढे  मुझे  देख  रही  थी  और  मैं  नारू  की  दूकान  से  25 पैसे  की  गरम  मूंगफली  ले  रहा  था .  मैंने  मूंगफली  जेब   में  डाली  तो  उसके  गरम  होने  का  एहसास  मेरी  दाईं जांघ  को  छू  गया. सर्दी  मुझे  देख  कर  मुस्कुरा  रही  थी  और  मैं  मूंगफली  से  भरी  जेब  देख  कर. मैंने  एक  मूंगफली  निकाली  और  उसको  तोडने  लगा …5 साल के  छोटे  छोटे  हाथ  सर्दी  की   वजह  से  सुन्न  हो  चुके  थे …या  मुझ  में  तब  शायद  मूंगफली  तोडने  का  भी  हुनर  नहीं  था…पता  नहीं  क्या  था.

मूंगफली  लेकर  घर  जाते  हुए  रस्ते  में  भाई  मिल  गया …बड़ा  था …उस  वक़्त  मेरे  लिए  सब  से  ताक़तवर  इंसान …जो  मेरे  सारे  दोस्तों  को  पीट  सकता  था , डरा  सकता  था , खेलते  खेलते  घर  भगा  सकता  था …और  मुझे  हरा  सकता  था  सर्द  रजाइयों  के  ऊपर  होने  वाली  हर  कुश्ती  में . मैंने  उसे  रोका ,

“भाई  मेरी  मूंगफली  तोड़ो”

उसने  मूंगफली  ली , तोड़ी , और  मेरे  चेहरे  पर  मूंगफली  के  सवाद  जैसी  मुस्कान  आ  गयी , लेकिन  उस  टूटी  हुई  मूंगफली  के  दाने  मेरे  हाथ  में  आने  की  बजाये  उसके  मुंह  में  चले  गए . मैंने  उदास  आँखों  से  भाई  को  देखा  तो  वो  बोला,

“और  निकाल”

मैंने  बिना  कुछ  बोले  2-4 और  निकाल  कर  उसे  दी ,  इस  उम्मीद  से  की  मूंगफली  चबाने  का  जो  सवाद  वो  ले  रहा  है  वो  जल्द  ही   मुझे  भी  मिलेगा. लेकिन  ऐसा  नहीं  हुआ.

“जा  घर  जाकर  दीदी  से  छिलवा  ले, मैं  टिउशन जा  रहा  हूँ”

“मेरी  4  मूंगफली  वापिस  करो”

“तेरे  पास  हैं  न  इतनी …जेब  में ”

वो  मेरे  चेहरे  की  उदासी  और  मायूसी  को  बिना  पढे  टिउशन  पढने  चला  गया. और  मैंने  जेब  को  हाथ  लगा  कर  देखा  कितनी  कम  हो  गयीं . 5-7 कम  थीं  और  मैंने  एक  भी  नहीं  खाई  थी. अब  सर्दी  मुझे  मुस्कुराती  हुई  नहीं  चिढाती  हुई  लग  रही  थी. नारू  की  दूकान  से  घर  तक  का  फासला  100 कदम  से  ज्यादा  का  नहीं  था  लेकिन  फिर  भी  सर्द  मौसम  में  गरम  मूंगफली  के  सवाद  की  इच्छा  इतनी  तेज़  हुई  की  मैं  दौड़ने  लगा  घर  की  तरफ.

दीदी  आँगन  में  बैठी  बुश  के  रेडियो  पर  आल इंडिया  रेडियो  की  उर्दू  सर्विस सुन  रही  थी …दोपहर  3.30 बजे  शुरू  होने वाला  प्रोग्राम ‘आपकी  पसंद’.

“दीदी  मूंगफली  छील  दोगे ?”

दीदी  ने  मेरी  तरफ  देखा  और  तुनक  कर  बोली , “तुझे  खाने  के  सिवा  कोई  काम  नहीं  है …किसने  दिए  पैसे ?”

“अम्मी    ने ” मैंने  बहुत  सहमी  हुई  आवाज़  में  कहा .

“तो  जा  अम्मी  से  ही  छिलवा ”, पता  नहीं  किस  बात  की  नाराज़गी  जताते  हुए  उसने  जवाब  दिया.

“अम्मी  कहाँ  है ?”,

मैंने  डरते  डरते  पूछा  क्योंकि  उसको  कभी  भी  चांटा  मारने  का  हक  था . मुझे  पढ़ाती जो  थी  वो  और  कहती  भी  रहती  थी  की  मैं  नालायक  हूँ , मेरे  दिमाग  में  पता  नहीं  क्या  भरा  है , मुझे  कोई  भी  बात  एक  बार  में  समझ  नहीं  आती . शायद  सच  ही बोलती  होगी  वो.

उसने  ये  बताने  की  बजाये  की  अम्मी  कहाँ  है  मुझसे  सवाल  किया , “अब  अम्मी  को  तंग  करेगा  तू ?”

मैं  कोई  जवाब  न  दे  सका  क्योंकि  मैंने  कभी  सपने  में  भी  नहीं  सोचा  था  की  मैं  अपनी  अम्मी  को  तंग  कर  सकता  हूँ . मैं  चुप  रहा  और  बस  आँखें  झुका  लीं.

“ऊपर  छत  पे  है ”

दीदी  के  गैरज़रूरी सवाल  से  सहमे  हुए  मेरे  पाँव  सीढियां  चढ़ने  लगे . मैं  छत  पे  पहुंचा. अम्मी  सबको  दोपहर  का  खाना  खिला  कर  अब  शायद  धूप में  बैठ  कर  खुद  खाना  खाने  की  तय्यारी  में  थी . मैं  भाग  कर  पीठ  की  तरफ  से  उसके  गले  से  लिपट  गया . उसके  मुंह  में  खाने  का  पहला  निवाला  था . शायद  थोडा  गला  भी  घुंट  गया  था  मुझसे  उसका , जोर  से  गले  लिपटने  की  वजह  से. उसने  मेरा  बाजू  पकड़  कर  मुझे  आगे  किया  और  पूछा , “क्या  हुआ…”

“मूंगफली  नहीं  टूट  रही”

वो  मुस्कुराई  और  बोली , “ला  मैं  तोडके  देती  हूँ”.

वो  मुझे  मूंगफली  तोडना  ऐसे  सिखाने  लगी  जैसे  ये  भी  कोई  हुनर  होता  है . जैसे  इसे  सीख  कर  मैं  जिंदगीभर  पेट भरने  की  चिंता  से  मुक्त  हो  सकता  हूँ, जैसे  ये  हुनर  सिर्फ  उसके  ही बच्चे  को  आता  है  मोहल्ले  भर  में. आखिरी मूंगफली  मेरे  हाथ  में  थी  और  मैं  उसे  पहली  ऊँगली  और  अंगूठे  में  दबा  कर  तोडने  की  कोशिश  कर  रहा  था .

“थोडा  और  जोर  लगा…शाब्बाश”

अम्मी  के  हौसले  ने  मुझसे  और  जोर  लगवा  दिया  और  मूंगफली  टूट  गयी , पता  नहीं  अम्मी  के  हौसले  से  या  मेरे  जोर  से . मेरे  डेढ़  इंच  के  होंठ  ख़ुशी  के  मारे कानों  तक  फैल  गए.

“मेरा  बेटा  सब  कर  सकता  है …” अम्मी  ने  मुस्कुराते  हुए  कहा .

तभी  दीदी  ऊपर  आई.

“अम्मी  और  रोटी  लाऊं ?”

अब  अम्मी  ने  दूसरा  निवाला  तोडा  था . वो  शायद  भूल  गयी  थी  की  मुझे  मूंगफली  तोडना  सिखाने  से  ज़रूरी  था  की  वो  खुद  खाना  खा  ले  पहले . दीदी  ने  अम्मी  की  प्लेट की  तरफ  देखा.

“आपने  तो  अभी  शुरू  भी  नहीं  किया  खाना , मुझे  पता  था  ये  ऊपर  आया  है  तो  ज़रूर  तंग  करेगा  आपको ”

तब  मुझे  इतनी  समझ  नहीं  थी  की  दीदी  से  कहूँ , ‘दीदी  तुम्हारी  भी  शादी  होगी …तुम  भी  माँ  बनोगी …तब  तुम्हें  पता  चलेगा  की  कोई  भी  बच्चा  माँ  को  कभी  तंग  नहीं  करता ’. अब  समझ  आई  है  तो  दीदी  मुझसे  पहले  ही  इस  बात  को  जान  चुकी  है  की  कोई  भी  बच्चा  अपनी  माँ  को  कभी  तंग  नहीं  करता .

माँ  मूंगफली  की  तरह  होती  है . बाहर  से  सख्त  अंदर  दानों  की  तरह  बहुत  कुछ  भरा  रहता  है  उसमें . वो  बहुत  कुछ  क्या  है  कोई  पिता  कभी  नहीं  जान  सकता . लव यू माँ .

-=-=-

10 responses to “Maa Mungphali Hai”

  1. Rutuja says:

    hey this is so touching…. very lovely and very true…. u r gr8

  2. Irshad Kamil says:

    Gurinder Singh Azad, Deepa Rao, Mahesh K Patel and 18 others like this.

    Rutuja Athalye Kathe
    very nice & very true
    Sunday at 7:32pm ·

    ‘Bharat Tiwari भरत तिवारी
    kya kahoon … bus ik dukhi sa sukhi hoon main
    Sunday at 7:41pm ·

    Irshad Kamil
    SORRY DOSTO ISS BAAR KI POST BAHUT BADI HAI…KYONKI MUDDA BHI BAHUT BADA THA…MAA
    Sunday at 7:51pm ·

    Pankaj Shukla
    इरशाद भाई, बहुत बढ़िया संस्मरण। बचपन याद आ गया।
    Sunday at 8:02pm ·

    Rutuja Athalye Kathe
    Irshadji, post is long but reading it ws lovely…’Maa’ as ‘Mungphali’ such a gr8 thought…u r gr8888888
    Sunday at 8:15pm ·

    Mrunalinni R Patil
    how sweet irshadji..very cutely yet seriously u wrote so many things..a childs mind ,relations and mom wow..and about the length and depth of the article this is just a chapter..one can write so many epics on maa.aapke write up ne mujhe bhi kai baatein yaad dilayi..thanx for a adorable short rewind on childhood and mom..
    Sunday at 8:27pm ·

    Punam Verma
    it reminded me my childhood and my eyes were full of tears…Happy mother’s day….
    Sunday at 8:30pm via Facebook Mobile ·

    ‘Bharat Tiwari भरत तिवारी
    इरशाद जी , मैं आज जो भी हूँ जैसा भी हूँ , मेरी माँ की ने जो सीख दी थी उसी का नतीजा हूँ .
    कुछ बातें जो मम्मी मुझे बोलती रहती थीं , तब समझ नहीं आती थीं , लेकिन आज अगर वो बातें मेरे साथ ना होती तो मैं शायद ; ये जो लिख पा रहा हूँ वो भी ना कर पाता…
    … आपन सोंचा कछु नहीं हरी सोंचा तत्काल , बली चाहा बैकुण्ठ को पठय दिया पाताल //
    इतनी शक्ति, आत्मबल मि… See Moreलता है इस से कि …
    … जाही विधि राखे राम , ताहि विधि रहिये //
    ये मुझे हर उस मोड़ पे राह दिखा देती है ; जहाँ सिर्फ अँधेरा नजर आ रहा हो.
    /// किस परिवार में भाइयों के व्यक्तिगत मतभेद नहीं होते … लेकिन मैं जब भी घर जाता था तो … “सोनू (मेरे घर का नाम) जाओ पहले दादा जी ( मेरे पापा के बड़े भाई) और बाई (अपनी ताई जी को हम बाई बुलाते थे) के पैर छु के आओ ” यदि मैं कहता था “जाता हूँ अभी” तो हमेशा एक ही जवाब “बेटे बड़ों का आशीर्वाद ले के आओ”///
    माँ जहाँ भी हो … तुम्हारा सोनू अब भी उन सब बातों को मानता है , बिना तुम्हारे बोले ,,, और हाँ बच्चों को भी वही शिक्षा दे रहा है जो उसे आप ने दी थी …
    बस…..
    Sunday at 8:56pm ·

    Raj Singh
    Irshadji hamare andar ki soch ko zinda rakhne ke liye Shukriya…..
    Sunday at 9:32pm ·

    Sagar Jnu
    nice
    Sunday at 10:09pm ·

    Amit Prasher
    Irshaad bhai………Bahut bahut shukriya……bachpan yaad karwane ke liye……
    Sunday at 11:34pm ·

    Aadore Azmat Beg
    Ye waqya bhi aapne aise bayaan kiya hai jaise koi meethi si kavita keh di ho… Dil chahta hai padhte jao… baar baar safar tay karo zeb mein mungphali liye ek maasoom se bachche ka uski ammi tak pahunchne ka ehad dilkash safar…

    Aaj hee ek dost ke status par aisa hee ek waqya padha, aapke saath share karna chahti hun-

    When I came home in the … See MoreRain. BROTHER asked,”Why didnt u take an umbrella.”SISTER scolded,”Why cudnt u wait till rain stopped.” FATHER said angrily,” Only after catching cold will realize. ‘But MOTHER while drying my hair said,”Stupid Rains, Cudnt it wait till my child came home.That’s MOM”
    Yesterday at 12:38am ·

    Yasser Usman
    Bahut khoobsurat irshad…jazbaat bhi aur lafz bhi.
    Yesterday at 10:16am via Facebook Mobile ·

    Ananya Abrol Annie
    just beautiful 🙂
    Yesterday at 11:12am ·

    Garima Srivastav
    क्या बात है….बहुत खूबसूरत….
    Yesterday at 11:34am ·

    Sum Neesha
    Ya very interesting story…AND…Mother is another name of sacrifice…:-)
    Yesterday at 12:32pm ·

    Parminder Kumar
    Isey Padh Kar Mujhe Tumhari Kavita “BERIYAN” Yaad Aa Gayi…Bahut Mazaa Aaya Padhkar…I Could Visualise That Naaru Ki Dukaan…That House…Javed Bhai, Didi & Ammi ji…And That Grey Winter Afternoon…
    Yesterday at 1:27pm ·

    Mahesh K Patel
    Reminded of my own childhood 🙂
    Yesterday at 2:24pm ·

    Nissar Khan
    kya baat hai….naaru da mesupak bhi yaad krata yaar,
    Yesterday at 3:03pm ·

    Rajinder Dhawan
    friend. aap me kuch khas baat hai.
    Yesterday at 3:19pm ·

    Deepa Rao
    Very nice.. Is this a story from your childhood?? :-))
    Yesterday at 3:35pm ·

    Shabana Khan
    padhte padhte aankhon mein aansoo aa gaye–when i lost my mom i was too young to realise what i lost but now i really miss her
    2 hours ago ·

    Irshad Kamil
    Shukriya dosto…Aap sab ke liye Munawwar Rana ka sh’er

    Jab Bhi Kashti Meri Sailaab Mein Aa Jaati Hai
    Maa Dua Karti Hui Khawaab Mein Aa Jaati Hai

  3. Irshad Kamil says:

    Sharat Jain, Mrunalinni R Patil and 2 others like this.

    Rutuja Athalye Kathe
    its lovely, u r gr8
    Sunday at 7:32pm ·

    Mrunalinni R Patil
    very nice and adorable..
    Yesterday at 3:53am

    Nielam Guptaa
    wah irshad ji, kya comparison hai…… cool.
    16 minutes ago

  4. Manju Garhwal says:

    aapki baat ne 4 saal ke Irshaad Kamil se milwa diya sir….. well Maa, Maa hi hoti hai sir….. Hum Maa ko hum kabhi shabdo mein vyakt nahin kar sakte……

  5. Javed Akhtar says:

    Padhte .. Padhte .. Pata hi Nahi Chala..Kaise Saalon ka Faasla Kuchh hi lamhon. main tai ho gaya….aisa lafzon ka jaadu sirf tum kar sakte ho…TUMHARA YAHI HUNAR ..TUMHARI TAAQAT AUR MAA KI UMEED HAI…Sach “Maa” hi ek aisa Rishta hai jiska koi Badal( Substitute) nahi….
    Iske aage har cheez be maani hai..

    Tere Daaman main Sitare Hain to honge Ai Falak,
    Mujhko meri Maa ki Maili Odhni Acchi Lagi.
    ..

  6. MehnazJaved says:

    Bahut pyara .. Ahsaas ..lafzon main piroya hai…Khuda Sab bachon ko Maa ka Pyar Naseeb Farmaye..Aameen

  7. Harpreet says:

    Irshad ji
    Aap ki yeh rachna bahut hi payaara aur khoobsoorat ehsaas hai…. har insaan apni zandagi mein ek baar yeh jazbaat mehsoos to karta hai, par is tarahan se usse kagaz par utarna… maasha allaa aapki kalam toh aankhon ko namm kar deti hai….Bahut khoob

  8. Qadeer Ahmed says:

    Bhai bahut hi acha laga padh kar,aansu rokna mushkil ho gaya.

  9. akash gedan says:

    Uuuuuffffff it’s very hard to swallow…
    Mahol sir. . …. And very nice sir…

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